Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

लिबास-ए-मुफ़लिसी

लिबास-ए-मुफ़लिसी

1 min
225


कल शब मैंने अपनी सारी चाहतें जाला के देखी है

जब से मैंने उन नन्ही आँखों मे बेबसी देखी है


खिलौना ना मिलने पर कितना रोते थे ना तुम

मैंने उन हाथों की रेत से दोस्ती देखी है


खाना खिलाने के लिए माँ को कितना परेशान करते थे तुम

कल राह चलते चलते मैंने जिंदगी में माँ की कमी देखी है


भूखे घूमते है अमीर होटलों में

मैंने एक माँ बाप की लाचारी देखी है


सर्दियों में तुम्हे अपने कम्बलों में कितनी ठंड लगती है ना

कल घर से निकला तो सड़क के किनारे एक सोई बच्ची देखी है


सभी अपनी प्रेमिकाओं को खुश करने में लगे थे

मैंने कल भरी दोपहर बचपन फूल बेचती देखी है


आँखें नम होती है तो हो जाने दो अभिषेक

मैंने तो दर्द में भी लोगों की हँसी देखी है



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy