लड़के हैं तो क्या हुआ
लड़के हैं तो क्या हुआ
मन में सागर - सा एहसास भरा है
पर आंखों से बेफिक्री छलकाते हैं
ज़िम्मेदारी का बोझ वो भी संभालते हैं
पर कंधे हल्के हैं यही झलकाते हैं ।
कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं
पर कहने से जी चुराते हैं
कह दिए भाव अगर , तो लोग ताने मारते हैं
उनके भावों को नर्मी के स्वभाव से तोलते हैं ।
बचपन से ही उनको सीख दी जाती है
कि आंखों की नमी सिर्फ लड़कियों को शोभा पाती है
यही बात को दिल में घर - सा बना लेते हैं
सबके सामने हंसकर ये अकेले में आंखें भिगो लेते हैं ।
ठिक से खिले की नहीं उन्हें सख्त बना दिया जाता है
जब सख्त ही बनाया तो समाज नर्मी की उम्मीद क्यों रखता है !
उम्र का लिहाज़ उनको भी नहीं रहता है
जब बात घर और ज़िम्मेदारी की आती है ।
सीने में दिल उनका भी धड़कता है
आंखों में दिखती नहीं मगर सपने वो भी बेशुमार पालते हैं
उन्हें भी कभी नमी से समझा जाए तो
वो भी औरों का दिल समझ सकते हैं ।
ना गलत हम और ना ही गलत वो है
बस बात समझौता और साझेदारी की है
कभी कभी उनको भी सुनना ज़रूरी है
लड़के हैं तो क्या हुआ आखिर वो भी तो इंसान हैं ।
