क्यों जीते हो सपनों में. ...
क्यों जीते हो सपनों में. ...
कहने को रहते हैं हम अपनों में
क्यों जीते हो सपनों में......
अपना कोन है. यंहा और कोन
है पराया, खुन ही खुन को
आग लगाता आया चीता में,
हर पल मरते उसका क्या होगा
इसका क्या होगा यही सोच में,
भगवान बन पालन हार बन
पालन करते हम इस नर्क लोक में,
कहने को रहते हैं हम अपनों में
क्यों जीते हो सपनों में......
कुछ पल को दिखावे के आंसू
गैर बहाते, अपने अफसोस के
लिए बेठे रहते बारह दिनों में,
किसी का जीवन रुकता नहीं
किसी के बिना, फिर क्यों
जरूरत पड़ती है साथ की जीने में,
कहने को रहते हैं हम अपनों में
क्यों जीते हो सपनों में.........
जीन अपनों की खातीर हम हर
खुशी लुटाते, वही अपने हमारे
मरने के पश्चात डर के मारे
पास एक पल बैठे नहीं पाते अकेले में,
कहने को रहते हैं हम अपनों में
क्यों जीते हो सपनों में.......
दिल मिले वही अपना है बाकी
सब सपना है, प्यार मिले वही
घर वाले है बेशक बेगानों में
कहने को रहते हैं हम अपनों में
क्यों जीते हो सपनों में.......
