कविता
कविता
यशोधरा के सवाल
मापनी- मुक्त
सोये शिशु साथ मुझे छोड़ चले,
मुझसे क्यों मुख मोड़ चले ?
जब त्यागना ही था ,तो अंगीकार क्यों किया?
और जब किया था अंगीकार,
तो निभाया क्यों नहीं?
आर्य! यदि मुझसे कहकर जाते,
तो क्या मैं आपके पथ की बाधा बनती!
सहज एक प्रश्न कौंधता मन में,
क्या मनु-सतरूपा साथ थे नहीं वन में!
आप पिता हैं, निष्ठुर हो मुख मोड़ सकते हैं।
पर मैं जननी, इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती हूँ!
अमृतपान कर रहा शिशु को,
अकेले कैसे छोड़ सकती हूँ!
उससे कैसे मुख मोड़ सकती हूँ!!
जन्म दिया है जब तनय को,
तो पालन से कैसे मुख मोड़ सकती हूँ!
आर्य! आप करें तप वन में,
मैं भी तप क्यों न करूँ महल में!
क्या अंतर पड़ता है?
तप तो आखिर तप ही होता है,
तप में तो सिर्फ प्रेम अरु भक्ति चाहिए ।
चाहे वह वन में हो या भवन में!
क्या अंतर पड़ता है?
राहुल कल बड़ा होगा,
सौ-सौ सवाल करेगा।
क्या जवाब मैं उसे दूँगी,
सोच-सोच कर मरती हूँ।
और सौ-सौ बार मैं हारती हूँ।
आर्य! आप जायें, तप करें,
आपको मिलेगी मुक्ति।
अपने आप मुझे भी मिल जायेगी मुक्ति।
मुक्ति आपको मिले या मुझे मिले,
क्या अंतर पड़ता है?
आप आयें तो, राहुल को सौंप,
मैं भी मुक्त हो जाऊँगी...
मैं भी मुक्त हो जाऊंगी...।
