कुदरत के खेल निराले
कुदरत के खेल निराले
अपने ही माता-पिता को कर आते हैं वृद्धाश्रम के हवाले।
उनके प्रति अपना फ़र्ज़ भुलाकर, ये संतान मतलब वाले।।
किसी -किसी के नसीब में तो, ये वृद्धाश्रम भी नहीं होता।
जन्म देने वाले ही पराए हो जाते, कुदरत के खेल निराले।।
क्यों भूल जाते हैं, जिन पैरों पर चलकर ये कृत्य कर रहे।
उनके माता-पिता ही हैं उन पैरों को चलना सिखाने वाले।।
जिनकी उंगली थाम दुनिया घुमा करते आज उनके लिए।
तुम्हारी दुनिया में कोई जगह नहीं तुम हो गए कहने वाले।।
क्या याद नहीं है वो पहला निवाला मांँ के हाथों से खाया।
क्या तुम भूल गए पिता के झूलाए झूले भी वो बाहों वाले।।
तुम्हारी जरूरतों को, कहने से पहले ही पूरा किया करते।
क्या भुला चुके माता-पिता के संग वो दिन बचपन वाले।।
तुम्हें एक छींक भी आ जाए तो नींद उनकी उड़ जाती थी।
फिर तुम ही कैसे बन गए, उनकी आंँखों में दर्द देने वाले।।
कितनी रातें जाग काटीं उन्होंने, हिसाब लगा नहीं सकते।
कुछ नहीं किया तुम्हारे लिए कौन हो तुम यह कहने वाले।।
तुम्हें जन्म ही नहीं दिया है पढ़ा लिखाकर लायक बनाया।
कैसे भूल गए माता-पिता ही हैं, पैरों पर खड़ा करने वाले।।
आज जब उन्हें तुम्हारे साथ, तुम्हारे सहारे की है ज़रूरत।
तुमने कर दिया उन्हें ही बेसहारा, कर वृद्धाश्रम के हवाले।।
क्यों सोचा नहीं एक बार भी तुमने क्या गलती की उन्होंने।
क्या उनकी गलती यही है कि वहीं है तुम्हें जन्म देने वाले।।
सोचना जरूर, माता-पिता की छाया है, ईश्वर से कम नहीं।
जन्नत वहांँ जहांँ हैं माता-पिता के हाथ आशीर्वाद देने वाले।।
