कुछ खट्टी कुछ मीठी
कुछ खट्टी कुछ मीठी
बहुत दिन हो गए हम कुछ कह ना सके
उथल–पुथल भावनाओं की लहरें हिलकोरे मारती थीं
कुछ कहने को जी करता था कुछ
खट्टी कुछ मीठी यादों को संभाले रखा था
दर्द का एहसास,
जनमानस की पीड़ाएं कराह रही थी,
किसानों की पीड़ा,
कोविड़ प्रकोप,
असीमित महँगायी की मार,
बेरोजगारी की भयावह तस्वीर,
नरिओं पर अत्याचार,
अपहरण,
बलात्कार,
अल्पसंख्यकों की दुर्दशा में हम उलझे हुए थे
चलो अच्छा हुआ मोतियाविन्द की
सिल्ली कुछ दिनों के लिए छाई हुई थी
हमें दर्द का एहसास होता रेल,
बैंक, लालकिला,
और सारे देश को मिलकर बेच डाला
रोशनी तो शल्य चिकित्सा के बाद आई,
चलो अच्छा हुआ हम कुछ देख ना सके
और किसी ने आकार चुपके से
मेरे कानों में कुछ कहा भी नहीं
अब नींद खुली पर क्या फायदा
हमने सोचा था कोई युगपुरुष आएगा
जब मेरी आँखें ठीक हो जाएंगी तब
स्वर्णिम भारत का यशगान सबके कंठों में गुनगुनाएगा
पर कुछ भी नहीं बदला इन अंतरालों में हम आहात होते गए,
आँखें खुली सब दिखने लगा
कुछ ही दिनों में हमरा देश बदल गया,
इन बदले हुए परिवेशों में हम अपनी व्यथा सुनते हैं
फिर सबको अपने भारत की बीती कथा बताते हैं।
