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Manisha Wandhare

Abstract

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Manisha Wandhare

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कुछ खामोश सी हो गई है कलम ...

कुछ खामोश सी हो गई है कलम ...

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कुछ खामोश सी हो गई है कलम ,

जबसे तुमने रंग बदला ,

पहलें तो हर रोज आती थी मिलने ,

और अब आठ दिनों का इंतजार ,

हाय इस फुरसतनेंही मार डाला ...

क्युँ बदली तुमने ये चाल ,

क्या हर सवाल किस्सा कहानी होगा ,

क्युँ नहीं हैं जगह कविताओं की ,

क्या दिल का? हाल ,

यूँ ही बेबसी का शिकार होगा ...

लिख हम भी लेते कहानियाँ ,

कमबख़्त वक्त जब हमारा गुलाम होगा ,

वो तो दौड़ाता है हमें ,

अब तुम ही बताओ ,

हमारी कहानी का लिखना ,

किस पन्ने पर शुरू होगा ...

तुम लाती थी रोज एक फूल ,

खुशबू सें हमारा दामन भी महका होगा ,

लोग पुछते थे हमें ,

बोलो किस बाग फूल होगा ,

लेकिन अब वो महक नहीं रही ,

वो फूल भी खिलता नहीं ,

दोष तुम्हें नही देते हम ,

हमारी आदतों का किस्सा ,

अब बयां होगा ...


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