कुछ और है।
कुछ और है।
मन्दिर, मस्जिद मैं कहॉं वह बैठा, उसका ठिकाना कुछ और है।।
तीर्थों में जाकर समय बर्बाद करना, अंतर में तीर्थ करना कुछ और है।।
याद तो तकरीबन सभी करते हैं, चिंतन में उतारना कुछ और है ।।
अपने लिए रोना तो आम बात है, दूसरों के लिए रोना कुछ और है।।
प्रभु नाम, का लेना सभी करते हैं, खुदी दिल से मिटाना कुछ और है।।
नींद में सो जाना तो आम है, उनके लिए आँखें बिछाना कुछ और है ।।
जीते तो सभी हैं मगर, दूसरों के लिए जीना कुछ और है।।
मुहब्बत करना कोई बुरा नहीं, इसमें मिट जाना कुछ और है।।
मंजिल तो सभी पाना चाहते "नीरज", उसकी मंजिल को पाना कुछ और है।।
