कुछ अधूरा सा
कुछ अधूरा सा
कुछ ढूंढ रहा हूँ जो नहीं मिला है
वो फूल अब तक नहीं खिला है
कुछ कमी तो खल रही है
तृष्णा कुछ तो पल रही है
यूँ ही नहीं है धुआँ उठा
कहीं आग तो जल रही है
बेक़रार यूहीं नहीं हूँ
मैने कब कहा मैं ही सही हूँ
घटाएं भी आ जा ही है
हवा रुख तो बदल रही है
मिल नहीं रहा कोई किनारा
भटक रहा हूँ मारा मारा
सब साथ है पर खोये हैं खुद में
मन ढूंढ रहा है कोई सहारा
उम्मीद की लौ भी मद्धम है
उठता शोर मन में हरदम है
ये कैसी बेचैनी हो रही है
माथे पर पसीना और सर्द मौसम है
इंतजार कर रहा हूँ उस पल का
सब द्वन्द मिटे मन चंचल का
वो वक़्त नहीं आया अभी तक शायद
पर कभी दिन तो चढ़ेगा उस नए कल का
कभी दिन तो चढ़ेगा उस नए कल का।
