STORYMIRROR

Pankaj Kumar

Abstract

4  

Pankaj Kumar

Abstract

कुछ अधूरा सा

कुछ अधूरा सा

1 min
357

कुछ ढूंढ रहा हूँ जो नहीं मिला है

वो फूल अब तक नहीं खिला है


कुछ कमी तो खल रही है 

तृष्णा कुछ तो पल रही है 

यूँ ही नहीं है धुआँ उठा 

कहीं आग तो जल रही है 


बेक़रार यूहीं नहीं हूँ 

मैने कब कहा मैं ही सही हूँ 

घटाएं भी आ जा ही है 

हवा रुख तो बदल रही है 


मिल नहीं रहा कोई किनारा 

भटक रहा हूँ मारा मारा

सब साथ है पर खोये हैं खुद में 

मन ढूंढ रहा है कोई सहारा 


उम्मीद की लौ भी मद्धम है 

उठता शोर मन में हरदम है 

ये कैसी बेचैनी हो रही है 

माथे पर पसीना और सर्द मौसम है 


इंतजार कर रहा हूँ उस पल का 

सब द्वन्द मिटे मन चंचल का 

वो वक़्त नहीं आया अभी तक शायद 

पर कभी दिन तो चढ़ेगा उस नए कल का 

कभी दिन तो चढ़ेगा उस नए कल का। 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract