कोरोना के पेले...
कोरोना के पेले...
जब कोरोना नहीं था
हम कितने अकेले थे!
ज़िंदगी के इतने मेलों में
सबके संग कोई न कोई
और हमने तो बस
बल्लियों के पीछे छिपकर
आँखों से अपने ख्वाब धकेले थे!
कि... जब कोरोना नहीं था...!
कि श्रृंगार रस के सब रंग वहाँ
अदृश्य तराजुओं पर तुला करते थे
और जाने किस-किस लेवल के लोग
(देखिए, ये कटाक्ष है
समाज, जाति, धर्म की आड़ से
प्रेमी दिलों पर ताला लगाने की विचारवृत्ति प्रखर करने वाले वर्ग पर...)
जाने किस-किस लेवल के
लोगों से मिला करते थे...
मेलों के इस महमानवीय बहाने पर
कोई रोकता,
तो रोकता भी भला कैसे?
हम निकलते थे
सब हमको
हम सबको देखते थे...
वो सब अपना दिल
और हम अपने दिल का हाल सेंकते थे....
अब जब कोरोना आया है
पहली बार जाकर खुद को हमने
कहीं सबके बराबर पाया है...
कि हम भी घर में बंद
इंतजार में किसी के ख्वाबों के
और वो भी घर में बंद
इंतजार में संग उनके होने के ख्वाबों के...
सच... बड़ी गज़ब सामाजिकता ला दी है
इन... कोरोना के रेलों ने...
पर हां, जिन मजदूरों के घर
किसी तरह त्यौहारों पर
कुछ दिए जल जाया करते थे
इस बार तो
उनके घर कढ़ाई में तेल के ख्वाबों पर भी
बड़े-बड़े धेले थे
कि असलियत में तो हम भी
और
असलियत में वो भी
सब ही अकेले थे!
