Bhoop Singh Bharti
Tragedy
कोरोना के कारणे, जावण लागे गाँव।
पैदल ही चालण लगे, भूखे नंगे पाँव।
भूखे नंगे पाँव, छाँव सा मिलै सहारा।
बेबस अर मजबूर, हुया मजदूर हमारा।
कहै भारती देख, दृश्य यो बड़ा घिनोना।
खूब सतावै भूख, अर वायरस कोरोना।
झूमता बसंत है
कुंडलिया : "म...
कुंडलिया
कुंडलिया : "प...
हाइकु : नव वर...
रैड क्रॉस
गीत
शहर की आब-ओ-हवा है ठीक नही तुम अभी आना नही। शहर की आब-ओ-हवा है ठीक नही तुम अभी आना नही।
तमस की गुहा में क्यों, स्त्रियाँ अब जल रहीं। तमस की गुहा में क्यों, स्त्रियाँ अब जल रहीं।
आज जब सदियों की खोज के बाद उसने ढूंढ़ लिया है 'ना ' शब्द। आज जब सदियों की खोज के बाद उसने ढूंढ़ लिया है 'ना ' शब्द।
अब अकेले तय न होगा यह दुःख भरा जीवन का सफ़र। अब अकेले तय न होगा यह दुःख भरा जीवन का सफ़र।
आज फिर एक माँ, आस के दीप जलाये गुमनाम हो गई। आज फिर एक माँ, आस के दीप जलाये गुमनाम हो गई।
अजी नौकरी का भी अपना मज़ा है। जहां अपनी चलती नही कुछ रज़ा है। अजी नौकरी का भी अपना मज़ा है। जहां अपनी चलती नही कुछ रज़ा है।
पंक्तियों की प्रेरणा बेच दी जब जाती है, वह रमणी कोठे पर रात भर वीर्य से नहाती है। पंक्तियों की प्रेरणा बेच दी जब जाती है, वह रमणी कोठे पर रात भर वीर्य से नहात...
अथाह स्वेद बहाती है। अपनी जठराग्नि बुझाती है।। अथाह स्वेद बहाती है। अपनी जठराग्नि बुझाती है।।
ना करो तुम हमको ऐसे रुखसत यूँ अपनी इन भीगी पलकों से। देखना फिर नया ख्वाब बनकर आएंगे एक ना करो तुम हमको ऐसे रुखसत यूँ अपनी इन भीगी पलकों से। देखना फिर नया ख्वाब बनकर...
वो अतीत की काली परछाई पल पल मन को दुखी कर जाती। वो अतीत की काली परछाई पल पल मन को दुखी कर जाती।
धिक्कारेगा तुम्हें ये कड़वा सच जिसे कहने से तुम डरते हो। धिक्कारेगा तुम्हें ये कड़वा सच जिसे कहने से तुम डरते हो।
चीखती नदी मौन प्रार्थना में लीन हो जाती है। चीखती नदी मौन प्रार्थना में लीन हो जाती है।
कहाँ बने उनके लिए कभी कोई अलग से 'कृपा भवन।' कहाँ बने उनके लिए कभी कोई अलग से 'कृपा भवन।'
राजनीति के खेल में क्या हार क्या जीत ; ना कोई शत्रु यहां और ना यहां कोई मीत ! राजनीति के खेल में क्या हार क्या जीत ; ना कोई शत्रु यहां और ना यहां कोई मीत !
इक दुबला पतला सा पेड़ था, चंद टहनियां चंद पत्ते थे। इक दुबला पतला सा पेड़ था, चंद टहनियां चंद पत्ते थे।
कहने लगा, "फर्ज़ अदा करने की सज़ा मिली है एक बाप को।" कहने लगा, "फर्ज़ अदा करने की सज़ा मिली है एक बाप को।"
है कितना क्षण भंगुर यह जीवन, अगले पल का पता नहीं। है कितना क्षण भंगुर यह जीवन, अगले पल का पता नहीं।
खेतों से गांवों से कस्बों से शहरों से जैसे बसंत गायब खेतों से गांवों से कस्बों से शहरों से जैसे बसंत गायब
कौन जाने किस किस कोख़ से, जन्म कुपुत्र का होता है। कौन जाने किस किस कोख़ से, जन्म कुपुत्र का होता है।
धरती ऐसे जल रही, जैसे जले मशाल। धूल-धूल रस्ते हुए, सूखे-सूखे ताल। धरती ऐसे जल रही, जैसे जले मशाल। धूल-धूल रस्ते हुए, सूखे-सूखे ताल।