कल्पना की उड़ान
कल्पना की उड़ान
वह बेबस बच्ची करती माँ की सहायता हरदम,
फटे कपड़े, हाथों में छालें और पेट में भूख लिये,
जाती माँ संग चार घरों में धोने बर्तन,
कोई दुत्कारता तो कोई दे देता चन्द टुकड़े रोटी के।
आँखों में हज़ार सपने संजोये वह बच्ची,
खोई रहती कल्पना लोक में कभी जागी कभी सोई,
माँ करती रहती असफ़ल चेष्टा अपनी आँखों से,
पहुँचने की बच्ची के कल्पना लोक में।
स्कूल जाते बच्चों को देख पहन स्कूल के नये-नये कपड़े,
बैठ बस में पहुँच जाती स्कूल, पढा़ई करती मन लगा कर,
पढ़ई में सबसे आगे, खेल में सबसे आगे, व्यवहार में सबसे आगे,
अध्यापिकाओं की दुलारी पहुँच गई कालिज में।
आँखों में हज़ार सपने संजोये वह बच्ची,
खोई रहती कल्पना लोक में कभी जागी कभी सोई।
कालिज में की पढ़ाई, सीख नृत्य, संगीत हुई उसमें पारंगत
नहीं पता था करना क्या है कालिज के आगे,
सब चलाते हुक्म उस पर तो करी कल्पना ऐसी,
कि बन अफ़सर चलाने लगी हुक्म सब पर।
आँखों में हज़ार सपने संजोये वह बच्ची,
खोई रहती कल्पना लोक में कभी जागी कभी सोई।
झकझोरा माँ ने तो आई बाहर निकल काल्पनिक जगत से,
देख अपनी असलियत बहने लगी अश्रु धारा आँखों से,
लग गले माँ के परोस दी आख़िर अपनी कल्पना की थाली,
अचम्भित हुई माँ देख बेटी की कल्पना की थाली।
आँखों में हज़ार सपने संजोये वह बच्ची,
खोई रहती कल्पना लोक में कभी जागी कभी सोई।
माँ भी रोई, परेशान हुई फिर पोंछ अश्रु जल पकड़ हाथ बच्ची का,
चल पड़ी बन साथी बच्ची की कल्पना की उड़ान की,
पकड़ पाँव अध्यापिका का उडेंल दी मन की बात,
दिया साथ अध्यापिका नें भेज दिया स्कूल बच्ची को।
आँखों में हज़ार सपने संजोये वह बच्ची,
खोई रहती कल्पना लोक में कभी जागी कभी सोई।
रख मान अध्यापिका का भरने लगी उड़ान अपनी कल्पना का,
पढ़ती गई आगे-आगे बढ़ती गई आगे-आगे, कभी न देखा मुड़ कर पीछे,
आया एक दिन वह भी जब बन अफ़सर लगी देने आदेश,
उड़ान भरी कल्पना की परन्तु जमा रहा पाँव धरती पर।
आँखों में हज़ार सपने संजोये वह बच्ची,
खोई रहती कल्पना लोक में कभी जागी कभी सोई।
