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Shailendra Kumar Shukla, FRSC

Classics

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Shailendra Kumar Shukla, FRSC

Classics

ख्यालो ने यूँ ....

ख्यालो ने यूँ ....

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ख्यालों ने यूँ बोलने से रोक लिय़ा 

सवालों ने यूँ टोकने से रोक लिय़ा 

खता क्या है , तुमको भूल जाने की 

फासलों ने यूँ मिटने से रोक लिय़ा !


कहाँ कहाँ सुनोगे मनचाहे कहकहे 

जहाँ जहाँ चुनोगे अनचाहे मनकहे 

फुरसत मिली औ साथ बैठे थे ज़रा 

मदभरी रात ने ड़ूबने से रोक लिय़ा !!


जवां धड़कने, मिलने से रोक पाओगे 

हवाये बेवजह चलने से रोक पाओगे 

संभल जाएं , पथ भ्रमित होकर भी क्यूँ 

सुनहरी य़ादों ने मिलने से रोक लिय़ा !


डगर डगर के साथ भी हैं मुशकिले 

हर समर के साथ भी हैं सिलसिले 

कसम तुम्हें क्यूँ दे आज भूल जाने की 

तुम्हारी बातों ने टूटने से रोक लिय़ा !


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