ख्वाब की हकीकत
ख्वाब की हकीकत
जब-जब गीत रचा मैंने आँखों के आगे तेरा चेहरा आया
समझ ना पाई दुनिया की रीत क्यों मैंने धोखा ही खाया
बांहें फैलाकर जब तुझको पुकारा हमेशा ख्वाब ही पाया
तू ख्वाब है या हकीकत मेरा दिल यह समझ ही ना पाया
जब-जब गीत रचा मैंने.......
ऐसी लगन लगी प्रीतम की हर बाधा तोड़ मैं पहुँच गई
जो ख्वाब था मेरा है वही हकीकत आज मैं समझ गई
तुमसे मिलकर ऐसा लगा जैसे मैं खुद को ही भूल गई
मेरे हर हसीन ख्वाबों को हकीकत सिर्फ तुमने बनाया
जब-जब गीत रचा मैंने.......
पाया हम दोनों ने एक दूजे को मन पर आज झूम रहा है
रोपी थी मैंने दिल में एक आस जो आज यहाँ पनप रहा है
मैं तुमसे और तुम मुझसे ये दिल हमारा हमसे पूछ रहा है
ख्वाब से हकीकत की दुनिया में धीरे- धीरे जैसे बढ़ रहा है
जब-जब गीत रचा मैंने......
