ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
जानता हूँ कि वे पूरे नहीं होते।
साथ कि किसी की दरकार नहीं !
जानता हूँ कि वे अधूरे होते।
मदद कि किसी की जरूरत नहीं !
जानता हूँ कि वे मदद के हाथ भी
एहसान के मजबूरे होते।
गीत किसी कि मुझे अब भाती नहीं !
जानता हूँ कि वे भी हालतों के आगे
फीके और बेसुरे होते !
ख्वाब अब देखता नहीं मै !
दिल में चल रही उथल-पुथल को
दिखाता अब नहीं मैं !
आँखों में आए पानी को
पोंछवाता नहीं किसी से मैं !
जानता हूँ कि वे हाथ की हमदर्दी भी
दिखावे से भरे-पूरे होते ।
ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
जानता हूँ कि वे पूरे नहीं होते।
न किसी की अब चाहत है !
न कुछ पाने की मुझे तमन्ना है।
खुद में ही रहने में पा ली राहत मैंनें।
अब झूठी हमदर्दी से रहना मुझे चौकन्ना है।
दिल के बाजार में बिकना नहीं मुझे !
किसी के आगे झुकना नहीं मुझे ।
खुद की ही सुझायी रास्ते पर चलना है मुझे।
किसी को कुछ दिखाना नहीं मुझे।
ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
शराब को मैंने कभी हाथ भी नहीं लगाया ।
फिर भी न जाने कैसे छाया मुझमें नशा है !
लूटा मुझे अपनों ने ही, हुई फकीरों जैसी दशा है !
हालातों पर कभी रोता नहीं मैं !
हँसी -मुस्कान में ही छिपे दर्द की सरबीरे होते !
ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
जानता हूँ ,कि वे पूरे नहीं होते।
ख्याली-पुलाव पकाना छोड़ दिया मैंने।
मन में उठती रहती तरंगों को तोड़ दिया मैंने।
सुखी- रोटी से ही शाम !
उसी को खाकर रात्रि
भोर भाव - विभोरे होते।
ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
जानता हूँ कि वे पूरे नहीं होते।
ख्वाब अब देखता नहीं मैं !
