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Brijlala Rohanअन्वेषी

Abstract Classics Inspirational

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Brijlala Rohanअन्वेषी

Abstract Classics Inspirational

ख्वाब अब देखता नहीं मैं !

ख्वाब अब देखता नहीं मैं !

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ख्वाब अब देखता नहीं मैं !

जानता हूँ कि वे पूरे नहीं होते।  

साथ कि किसी की दरकार नहीं !

जानता हूँ कि वे अधूरे होते। 


मदद कि किसी की जरूरत नहीं !

जानता हूँ कि वे मदद के हाथ भी 

एहसान के मजबूरे होते।

गीत किसी कि मुझे अब भाती नहीं ! 

जानता हूँ कि वे भी हालतों के आगे

फीके और बेसुरे होते ! 


ख्वाब अब देखता नहीं मै !        

दिल में चल रही उथल-पुथल को

दिखाता अब नहीं मैं !   

आँखों में आए पानी को

पोंछवाता नहीं किसी से मैं !      


जानता हूँ कि वे हाथ की हमदर्दी भी 

दिखावे से भरे-पूरे होते ।

ख्वाब अब देखता नहीं मैं !

जानता हूँ कि वे पूरे नहीं होते। 


न किसी की अब चाहत है !

न कुछ पाने की मुझे तमन्ना है।

खुद में ही रहने में पा ली राहत मैंनें।

अब झूठी हमदर्दी से रहना मुझे चौकन्ना है।


दिल के बाजार में बिकना नहीं मुझे !

किसी के आगे झुकना नहीं मुझे ।

खुद की ही सुझायी रास्ते पर चलना है मुझे।

किसी को कुछ दिखाना नहीं मुझे। 

ख्वाब अब देखता नहीं मैं !  


शराब को मैंने कभी हाथ भी नहीं लगाया ।

फिर भी न जाने कैसे छाया मुझमें नशा है ! 

लूटा मुझे अपनों ने ही, हुई फकीरों जैसी दशा है ! 

हालातों पर कभी रोता नहीं मैं !

हँसी -मुस्कान में ही छिपे दर्द की सरबीरे होते ! 


ख्वाब अब देखता नहीं मैं !

जानता हूँ ,कि वे पूरे नहीं होते। 

ख्याली-पुलाव पकाना छोड़ दिया मैंने।

मन में उठती रहती तरंगों को तोड़ दिया मैंने। 


सुखी- रोटी से ही शाम !

उसी को खाकर रात्रि

भोर भाव - विभोरे होते। 

ख्वाब अब देखता नहीं मैं !

जानता हूँ कि वे पूरे नहीं होते। 

ख्वाब अब देखता नहीं मैं !


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