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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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खुलकर जीना

खुलकर जीना

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खुलकर जीना आजकल बंद हो गया है

सबका हंसना आजकल मंद हो गया है 


कैसी हवा आजकल चल रही संसार मे,

हर शख्स उलझा खुद के मायाजाल में


खुलकर खिलना आजकल बंद हो गया है

खुलकर जीना आजकल बंद हो गया है


बनावट का जो आजकल चलन हो गया है

असलियत का चलन अब बंद हो गया है


सच्ची हंसी का जो यथार्थ खत्म हो गया है

बिखरे आंसू को समेटना भले मुश्किल है,


एक दीये से जगमग पूरा ये जग हो गया है

खुलकर जीना उनके लिये ही बंद हुआ है,


जिसका मन धूमिल और दूषित हो गया है

लाख शूलों में महकता गुलाब हो गया है


जिसका खुलकर जीने का सांस हो गया है

बनता साखी जो तू गर कोहिनूर की जात,


फिर तेरी रोशनी से फीका ये जग हो गया है

एक जुगनू से तम-सीना छलनी हो गया है

अपनी सच्ची मुस्कान को संभालकर रख

इस हंसी से ही तो ये दिल प्रसन्न हो गया है।


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