खुदा भी झुकता है
खुदा भी झुकता है
उस रात जब दुःख के ऊन से बुने मायाजाल के समक्ष,
दर्द खुदा से ज़्यादा ताकतवर हो गया,
जब दुःख ने तम के रस में भीगकर,
सियाह काले अंधियारे जादू का सहारा लेकर,
उस बेपरवाह वक़्त के साथ साजिश कर,
मौत की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया , तब
अगले दिन के उजाले में,
समुन्दर किनारे कुछ देर खुद के साथ वक़्त बिताने पर,
वहीं किनारे पर
अपने दुखों की लाश तैरती देखी मैंने,
चमत्कार होता देखा मैंने।
उम्मीद से मेरा हमेशा का साथ बाँध कर, उसका हाथ थाम कर,
अब फिर बढ़ चला हूँ मैं, मानता हूँ
समझता हूँ अब जादू और चमत्कार के अंतर को,
जादू की नींव में जुआ है, झूठ है, फरेब है
जादू होता तुक्के से है, की
चमत्कार है होता यकीन से है,
सत्य और सुंदरता जिसकी नींव में है,
करता जिसे मेरा खुदा है,
जो झुका था उस दिन की,
मेरा रुतबा मुझ मैं बढ़ जाए,
यकीन मेरा खुद मैं बढ़ जाए,
मुझे जीना सिखलाने मेरे प्रभु ने घटाया था अपना प्रभुत्व मेरे सामने,
दिखलाया था बड़प्पन मुझे आगे बढ़ाने, राह दिखलाने,
मुझे मुझसे श्रेष्ठ बनाने, मेरी झोले खुशियों से भरने,
झुका था मेरा खुदा खुद की श्रेष्ठता से, मुझे फिर उठाने।
