खुद से रुबरु
खुद से रुबरु
एक ख्वाहिश थी मन में, कुछ फुर्सत के पल जीने की ,
बहुत लम्बे समय जो अवसर की तलाश में थीं।
अब जब बात शुरू हो ही गयी हैं,
मन की।
तो कहने में हर्ज नहीं की इस ख्वाहिश के हर पहलू में, शामिल रहूंगी मैं ,आप,और हर वो नारी
जिसने संजोया अपने मन के संसार को , स्नेह, ममता,साहस, धैर्य, और आत्मविश्वास के उपमानों से।
आसान कहां होता हैं, खुद को खोकर एक नया कलेवर धारण करना।
हर परिस्थिति में अपराजित बनें रहना।
शिकायत किसी से क्या होगी।
मैंने खुद सबकुछ अपनाया है,
देकर , स्नेह निर्मल सा
जग में अपने सम्मान को पाया हैं।
एक उत्साह दिखा हर पल मन में
जब भी भीतर झांका अपने।
एक जुनून भी हैं, देखूं खुद को
अपनी आशाओं के दर्पण में।
मन क्या हैं,एक आभास ही तो हैं
जिद करता हैं, कहीं उड़ चलने को कहता हैं,कभी बहता हैं ,गोते खाता हैं,जब खुद को अकेला पाता हैं।
फिर मुस्कुरा कर अपने मन में ही
खुद को यह समझाता हैं।
स्नेह, ममता, परवाह, उम्मीद
साहस और आत्मविश्वास
जितना भीतर हैं, उतना
कहीं नहीं, दुनियां में।
पंख दिए हैं, तुमको भी तो ईश्वर ने
जरा देखो रख कर भूल तो नहीं गयी
मन की उलझनों के बीच।
तुमने दुनियां देखी,सबके मन को टटोला,पर भूल क्यूं गयीं अपने मन में ही झांकना।
बहुत आकर्षक हैं मन के भीतर की दुनियां, इसमें इतना कुछ हैं,शायद बाहर मिलना मुश्किल ही हों।
भीतर की किताब के पन्नों को खोल आज खुद से रूबरू होकर देख जरा,तेरा वजूद भी अपना हैं, और सपनों का आसमान भी।
