ख़ुद से मुलाक़ात -
ख़ुद से मुलाक़ात -
अब तन्हाई का हर लम्हा भी एक दस्तूर है-----
इन बंद दरवाज़ों के पीछे जो एक ज़माना था,
आज उस ज़माने की ज़ंजीरें पिघलने लगी हैं।
बहुत संभल कर चले, हम महफ़िलों में मगर,
आज तन्हाई में ही सही राहें निकलने लगी हैं।
अब न कोई शिकवा है जहाँ से, न कोई गिला,
खुद से ही मिलकर ही जैसे सब कुछ मिला है।
पतझड़ के उस पुराने से सूखे दरख़्त पर भी,
शिद्दत से अब रूह का एक नया फूल खिला है।
जो धुंध थी उम्मीदों पर, वो अब छटने लगी है,
ख़ामोशी से जो शिकायत थी, वो बँटने लगी है।
ज़माने की बंदिशों ने भी आज़माया हमें मगर,
अब खुद से मोहब्बत की सुबह घटने लगी है।
निकल पड़े हैं उस ओर जहाँ फैला सिर्फ नूर है,
ये दिल अब हर एक बाहरी शोर से बहुत दूर है।
पा लिया है खुद को ही इस कदर हमने आज,
कि अब तन्हाई का हर लम्हा भी एक दस्तूर है।
By Pratima Devi
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