खुद की तलाश
खुद की तलाश
हर इंसान से कई रिश्ते जुड़े है,
बेटा बेटी, भाई बहन, पति पत्नी,
माता पिता,
और भी कई बेनाम रिश्ते है
जो जुड़े है एक दूसरे से,
फिर भी हर किसी की पेचां अलग है।
इन सब रिश्तों को निभाते निभाते,
हम खुद कहीं खो गए है,
जिसने तलाश कि उसे अंधेरा है मिला,
इतनी खूबसूरती से हर इंसान
रिश्तों को निभा रहा है,
कि खुद को कहां किस मोड़ पे
खो बैठे पता ही नहीं चला,
कुछ सालों बाद जब एहसास हुआ ,
तो शुरू हुआ खुद को ढूंढने का काम,
काम तो बड़ा आसान लगता है,
शीशे में देख लो मिल जायेगा जवाब,
पर हुआ यह की शीशे वाला ही
अजनबी लगने लगा
उसने इतना बदल लिए खुद को
कि परछाईं भी इंकार कर दे
उसे देखने पर
फिर कहां चला गया होगा?
यह सोचा जब समझ आया,
कि मैं तो बदल गया,
कोई पैसे से बिक गया,
कोई मोहब्बत में खो गया,
कोई नशे में चूर चूर हो गया,
कोई इतना ऊपर उड़ गया कि
नीचे ही नहीं आ पा रहा,
कोई इतना आगे निकल गया कि
माँ बाप को भूल गया,
कोई इतना पीछे रह गया कि
आगे बढ़ने की चाह भूल गया,
तो कोई नफरत के बादलों में घिर गया,
किसी का मान बढ़ गया तो
किसी का अपमान हो गया,
मुस्कुराते मुस्कुराते रोना भूल गए,
ग़म छुपा कर जीना सीख लिया,
घमंड में चूर उड़ना सीख लिया,
यह कैसा मोड़ आ गया,
जहां खुद कि वजूद ही नहीं रहा,
जैसे समय बदला हम भी बदलते गए,
समय की रफ्तार से बिना
डरे भागते रहे,
अब जब रुके तो एहसास हुआ कि
मैं मैं ना रहा,
शुरू कर दी अब तलाश खुद की,
जो वक़्त बचा जिंदगी का उसे
जी लेने का मन हुआ,
बचपन में खुद को ढूंढने का मन हुआ,
निकल पड़े ही अपने ही अंदर के
इस मैं से लड़ने,
जीतने की चाह में फिर खुद को
तलाशने का मन हुआ
आज फिर खुद को तलाशने का मन हुआ!!!
