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Minal Aggarwal

Tragedy

4  

Minal Aggarwal

Tragedy

कैसी है यह दुनिया

कैसी है यह दुनिया

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240

व्यथित हो जाती हूं 

दुखी हो जाती हूं 

अस्त व्यस्त हो जाती हूं 

कोई संभालने वाला नहीं है मुझे 

खुद ही मन को समझाती हूं फिर 

धीरे धीरे संभल जाती हूं 

शिकायतें तो मेरी सारी जायज है लेकिन 

उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है 

मैं सुनाने को तैयार हूं 

अपने मन की व्यथा पर 

उसे सुनने के लिए 

किसी के पास समय नहीं है 

कभी कभी लगता है कि 

यह जीवन बेकार है और 

मैं कोई इंसान नहीं बल्कि 

हूं जमीन पर रेंगता ही 

कोई कीड़ा 

मानव में संवेदना का तो लगता है 

जैसे अंत हो चुका है 

जमीन पर रेंग रही है जो 

चींटी 

वह मुझे किसी मानव से अधिक 

संवेदनशील और 

अपने जीवन में किसी 

मकसद को लेकर चलती हुई 

दिखती है 

कभी कभी लगता है 

मैं हो गई हूं 

अपने घर के आंगन में लगा 

हुआ कोई बूढ़ा पेड़ 

जिसको घर के लोग 

पानी देना भूल गये हैं और 

उसके पास आकर 

पल दो पल उसकी छाया के 

नीचे आराम से बैठकर 

बतियाना भी भूल गये हैं 

मेरे सारे पत्ते झड़ते जा रहे हैं 

मैं सूख रही हूं 

मेरा जीवन खत्म होने की कगार पर है 

कोई बहार मुझे अपना मुंह नहीं दिखाती 

पतझड़ की लगातार मार से मैं मरी 

जा रही हूं 

मुझे जीवन के इस शायद अपने अंतिम मोड़ पर है 

किसी हमदर्द की जरूरत 

अपनों की आवश्यकता 

प्यार की, अपनाहट की 

चाहत लेकिन 

यह समय हो या था 

वह यौवनकाल का 

मैं तो लोगों का व्यवहार 

पहले भी और अब भी 

ऐसे ही पा रही हूं 

मैं इस दुनिया में आयी तो 

उन्हें कोई खुशी नहीं 

अब जा रही हूं या 

जल्द ही चली जाऊंगी तो 

कोई दुख नहीं 

कैसी है यह दुनिया 

यह पहेली 

मैं सच में 

सुलझा नहीं पा रही हूं।



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