काश
काश
एक लफ़्ज़ जो मेरे दिल में घर कर जाता है।
भूलना भी चाहूँ तो कमबख़्त भूल नहीं पाता है।
शिकायतें कुछ नहीं मुझे फिर भी एक कसक सी बाकी है,
जिसकी कमी है मुझमें वो सिर्फ़ बेबाक़ी है।
बोलना तो चाहती हूँ मैं बहुत कुछ तुमसे,
पर ज़ुबां पर ख़ामोशी के सिवा नहीं कुछ आता है।
शायद तुम समझे नहीं किस लफ़्ज़ की बात करती हूँ मैं,
क्योंकि वो लफ़्ज़ बस "काश" बनकर ही रह जाता है।
- Pooja Varshney (poojavarshney19@gmail.com)
"यह मेरी मूल कविता 'काश' है। कृपया इसे बिना मेरी अनुमति के कॉपी न करें।"
