"बेटियों की माँ"
"बेटियों की माँ"
वैसे तो बहुत देखे हैं दुनिया में भेदभाव, दिया है पर जिसने सबसे ज़्यादा दिल को घाव,
उसकी ही एक कहानी आज सुनाऊँगी तुम्हें, क्या बीती उस माँ पर बतलाऊँगी तुम्हें।
जब कोख में बच्चा था तो लाडो से रखा माँ को, पर गोद में आते ही ग़मगीन हुआ समा वो।
कारण बस इतना था कि वो लड़का न था लड़की थी, यूं बेवजह की बात से ही दुनिया तो भड़की थी।
दुनिया भी वही थी जो पूजती थी लक्ष्मी, उस लक्ष्मी के आने पर वही हुई ज़ख्मी।
शुरुआत पक्षपात की बस हुई यहीं से, बाकी बची कहानी भी बतलाऊँगी तुम्हें।
समझाया सबने मन को फिर लड़के की आस में, जुट गई पूरी दुनिया उसे पाने की प्यास में।
दुलार में कमी थी पर पहले की अपेक्षा, मन में माँ के फिर भी कोई भय नहीं था।
एक जैसे थे उसके लिए लड़का हो या लड़की, बेटा हुआ तो राम, बेटी तो वैदेही।
खुश नहीं थी दुनिया फिर सीता के जनम से, बाकी बची कहानी भी बतलाऊँगी तुम्हें।
बेचारी बन गई थी सबकी नज़रों में वो माँ, जो तीसरा भी कोख से कन्या को था जना।
रास घर न आया बिना बेटा किसी को, यही रीत चली आ रही बीते कई बरसों।
पर माँ के एक शिकन की तक लकीर नहीं थी, लक्ष्मी थी उसकी बेटियाँ, वो फ़क़ीर नहीं थी।
बोले कोई बुद्धू तो कसे ताने किसी ने, बाकी बची कहानी भी बतलाऊँगी तुम्हें।
एक घर के ही आंगन में भेदभाव था भारी, बेटे की माँ थी रानी, माँ बेटी की बेचारी।
ना सोचा था कि माँ में भी देखूँगी ये तुलना, ज़रूरी बस अब लोगों के विचारों का खुलना।
हैरान थी मैं देख के दुनिया को यूँ हताश, माता-पिता को छोड़ मानो पूरा जग निराश।
पर ना झुकी वो माँ इस ज़माने के सामने, चाहा कि सभी बेटियाँ उसकी काबिल बनें।
बस ये कहानी थी जो एक सुनानी थी मुझे, खोले वो सभी राज़ जो उस माँ के थे छुपे।
