तन्हाई की महफ़िल
तन्हाई की महफ़िल
कभी ग़ुमसुम सा बैठा हूँ, कभी चुपचाप हूँ सहमा।
कि चारों ओर के इस शोरगुल में भी हूँ मैं तन्हा।
हाँ यूँ तो हूँ अकेला मैं नहीं, मुझको पता है ये,
घिरा हूँ भीड़ में लेकिन चुरा लूँ एक खुदी लम्हा।
भरे लोगों की महफ़िल में, यूँ वाहिद ही खड़ा हूँ मैं।
बहुत हैं टोकने वाले, पर अपने में अड़ा हूँ मैं।
ये दुनिया चाहती है रोकना मुझको बड़ा लेकिन,
ना पहले था कभी मैं रुका, ना अब ही तो रुका हूँ मैं।
कोई समझे मुझे जोगी, तो कोई बावला बोले।
मगर मैं वो नहीं जो और के जज़्बात को तोले।
माना हाँ मैं रहता हूँ तन्हाई के अंधेरे में,
इस आलम की चमक में भी दरीचा ना कोई खोले।
- Pooja Varshney (poojavarshney19@gmail.com)
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