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Pooja Varshney

Tragedy Action Others

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Pooja Varshney

Tragedy Action Others

पहलगाम

पहलगाम

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क्या गुज़री उस माँ पर, जिसकी आँख का तारा गया।
उस पत्नी का तो सोचो, जिसके जीने का सहारा गया।
बस पंजाब, मराठा, कन्नड़ में हम बंट कर ही तो रह गए, 

हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम में घट कर रह गए।
पर अंत में सब भाषाओं का घमंड ही सारा गया।
क्या गुज़री उस माँ पर...

हिंदू हो या नहीं, बस धर्म पूछा मौत ने।
पड़ोसी हो या भाईचारा, कुछ न देखा सौत ने।
जो जानते गर कलमा भी तो खतना से बचे कहाँ,
भाषा, प्रांत, जाति का जुनून धरा रह गया।
क्या गुज़री उस माँ पर...

इंसानियत तो जैसे मुँह फेर कर चली गई।¯¯
मासूमियत भी वहाँ पैर तले कुचली गई।
तलाश में गए थे एक हसीन नज़ारे को सब,
लेकिन मिली तो गोलियाँ और चीख पुकारा गया।
क्या गुज़री उस माँ पर...

अब वक़्त गवाने से नहीं होगा कोई काम भी।
बच्चा बच्चा जानता है यहाँ दुश्मनों का नाम भी।
बहुत ज़ुल्म सह लिया है शांति की आस में,
सब्र का अब टूटा बाँध और बढ़ता पारा गया।
क्या गुज़री उस माँ पर...

1971 हो या फिर कारगिल का युद्ध हो।
अमन हमीं ने चाहा पर तुम सदा विरुद्ध हो।
उरी हो या पठानकोट या फिर पहलगाम हो,
छुप कर वार करने का तुमने सहारा लिया।
क्या गुज़री उस माँ पर...

शायद तुम भूल गए उस सर्जिकल स्ट्राइक को।
बिक जाओ गर बोल दिया लौटाने को हर भीख को।
आतंक जो पाल रखा तुमने अपनी गोद में,
उस गोद को उजाड़ने का वक़्त अब है आ गया।
क्या गुज़री उस माँ पर...

Pooja Varshney

(Don’t share without permission)


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