काल विधाता की चाल
काल विधाता की चाल
उम्र सारी हम छलकते आंसू छुपाते रहे
सह के दर्द औरों की महफ़िल सजाते रहे
दो अक्षर लिखे लोग शायर समझते रहे
हम तो गम को गीतों के धुएं में उड़ाते रहे
भाग्य को ही अपना आयाम समझते रहे
खोया बहुत कुछ पर नाकाम ना रहे
हौसले की धार को तेज करते हुए
राह में आये हर पत्थर को तोड़ते रहे
हर बाधा में अवसरों को खोजते हुए
तरकश में संजोते उनको आगे बढ़ते रहे
मंज़िल थी मुशिकल, खाइयां भी थी कई
ना रुके,ना झुके, लक्ष्य पर तीर दागते रहे
काल हमारे बस में नही, विधाता की चाल है
हर चाल को स्वीकारते, विश्वास कायम रखते हुए
मृग तृष्णा को त्याग कर,मन को सहज करते हुए
समय की धारा संग बस यूं ही हम बहते रहे
कामयाबी का हो जनून, और हौसला भरपूर
भूत भविष्य को भूल कर जो वर्तमान में जिए
मेहनत, लगन, आस्था के बान संग हो जब
खुल जाते है रास्ते, जलते हैं विजय के दिये!
