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Savita Patil

Drama Abstract


5.0  

Savita Patil

Drama Abstract


कागज़ पर उतारूं कैसे !

कागज़ पर उतारूं कैसे !

1 min 515 1 min 515

उड़ते ख्यालों को थामूं कैसे ?

कागज़ पर उतारूं कैसे ?

शब्दों की कभी तंगी हो जाती है,

कलम की स्याही सूख जाती है,

विचारों का मेला होता है,

और मन कहीं अकेला होता है !

 

भाव उभरते हैं किसी ज्वार से,

गहरे हृदय-सागर से,

पर टकराकर किनारों से,

लौट जाते है बेसहारों से !

 

साथ देते नहीं अल्फाज़,

अनछूहे ही रह जाते है साज,

उठती तरंगों को गहू कैसे ?

कागज़ पर उतारूं कैसे ?

 

शब्दों की श्रृंखला टूट जाती है,

पिरोती तो हूं पर माला छूट जाती है !

भाव बिखरते है मोतियों की तरह से,

सम्भाल लेती हूं किसी भी तरह से !

 

कब तक कलम की नोंक पर आकर लौटेंगे,

कब इन भावों को सही अल्फाज़ मिलेंगे ?

कागज़ फिर कोरा ही रह गया,

सैलाब आते-आते थम गया,

बिजली चमकी, बादलों में खो गई !


जगी भावनाएं, थककर सो गई !

फिर इन्हें जगाऊं कैसे ?

कागज़ पर उतारूं कैसे ?


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