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Savita Patil

Abstract


5.0  

Savita Patil

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ये लिबास तो पुराना होगा !

ये लिबास तो पुराना होगा !

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कौन-सी तारीख,

कौन-सा ठिकाना होगा ?

न जाने ज़िन्दगी का

मौत से मिलने का क्या बहाना होगा ?


जीने में हूं व्यस्त इतना,

मानो हमेशा ही मेरा जीना होगा,

न जाने ज़िन्दगी का

मौत से मिलने का क्या बहाना होगा ?

 

ये कैसा भ्रम है अपना,

ये कैसी सोच है!

सच से मूंदे आंखें,

सभी यहां मदहोश है!

कर लो चाहे जो भी जतन,

ये लिबास तो पुराना होगा !


न जाने ज़िन्दगी का

मौत से मिलने का क्या बहाना होगा ?

 आईना दे रहा है सबूत रोज़ाना,

मेरा ही नहीं रूकता इन्हें मिटाना,

कभी झुर्रियां, तो कभी

बालों की सफ़ेदी छुपाना,

ये लिबास तो पुराना होगा !

 

बस, ये तो गुजरेगी

रेत है हाथों से फिसलेगी !

नहीं रूकेगा इसका यूं पिघलना,

व्यर्थ होगा तेरा इसे थामना,

ये लिबास तो पुराना होगा !

न जाने ज़िन्दगी का

मौत से मिलने का क्या बहाना होगा ?


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