जुड़े रहना अच्छा है तन्हाई से
जुड़े रहना अच्छा है तन्हाई से
साथ रहकर भी जुड़ नहीं पाते
ऐसी बेबसी सिर्फ रेत की होती है,
भावनाओं से भरे हुए लोग सदा
बिखरे हुए जज़्बात समेट लेते हैं।
बंधे हुए रिश्तों कि डोर में अक्सर
होती है बंदिशों का अहसास मन में,
जिनके जीवन में नहीं कोई होता
वो किसी अपने के साथ को रोते हैं।
कोई कबतक धाराओं में बहता रहेगा
किनारे कि तलाश होती है एक दिन,
समंदर कि तरंगे या मन के हिलोरे हों
रुक जाना चाहते हैं सुकूँ के दहलीज पर।
रुकते हैं नदी का पानी पीने के लिए सब
अपनी ख़ुशी अपनी व्यथा वो नहीं जताती,
कुछ ऐसे ही फ़िदरत के मिलते हैं यहाँ भी
रहते हुए साथ कुछ साझा करने से कतराते हैं।
ख़ास बनने, होने,दिखने की लालसा हमें
कैसे ख़ास से सामान्य फिर बदतर बनाती है,
पता चलने तक ठोकरों में जान फंस जाती है
खुद को पाने में ही यहाँ उम्र निकल जाती है।
कोई हमारी सुने-समझे अच्छा लगता है तब
वही जब अपनी बातें कहता है हम उकताते हैं,
दिखावे की चाहत में अपनों को भूलते जाते हैं
दर्द में फिर क्यों दूर किये अपने ही याद आते हैं।
