जन्माष्टमी!
जन्माष्टमी!
मथुरा की जन्मभूमि में, द्वारका की कर्म भूमि में,
बिखरे लाखों रंग आपने, वृंदावन की रंगभूमि में।
असुरों के शोर में, गोपियों के खींचतान के जोर में,
खेलें नटखट खेल आपने, मैया के ममता के डोर में।
कालिया नाग के फन में, रुक्मणी के संग लगन में,
बाँधा पवित्र रिश्ते का भाव, राधा के प्रेम मगन में।
इन्द्र के घमंड के प्रहार में, कंस मामा के संहार में,
बचाई द्रौपदी की लज्जा, नामर्दों के दरबार में।
युद्ध के प्रचंड धार में, सुदर्शन चक्र के हथियार में,
दिया संसार को ज्ञान की रोशनी, गीता के सार में ।
दोस्तों, जिनके स्वरूप से पूरा ब्रह्मांड हुआ मंत्रमुग्ध,
कर लो आज जन्माष्टमी में अपना मन मंदिर भी शुद्ध।
