STORYMIRROR

Shubhanshu Shrivastava

Tragedy

3  

Shubhanshu Shrivastava

Tragedy

ज़माने

ज़माने

1 min
156

जिंदगी नही मिली पर जिंदा हूं मैं

आसमान का टूटा हुआ परिंदा हूं मैं

लोग पीते रहे खुशनुमा महफिलों में

महफिलों से भी तो शर्मिंदा हूं मैं।


इस कदर पत्ते शाखों से टूट जाते थे

जैसे सिर्फ फूलों की खुशबुओं का इंतजार हो

कफन भी ना भीग पाए अश्कों से जहां

ऐसे बेदर्द ज़माने का बंदा हूं मैं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy