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Sanjay Verma

Drama

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Sanjay Verma

Drama

जल की पाती

जल की पाती

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जल कहता है 

इंसान व्यर्थ क्यों ढोलता है मुझे 

प्यास लगने पर तभी तो 

खोजने लगता है मुझे।


बादलों से छनकर मैं 

जब बरस जाता 

सहेजना ना जानता 

इंसान इसलिए तरस जाता।


ये माहौल देख के

नदियाँ रुदन करने लगती

उनका पानी आँसुओं के रूप में

इंसानों की आँखों में भरने लगती।


कैसे कहे मुझे व्यर्थ न बहाओ

जल ही जीवन है

ये बातें इंसानो को कहाँ से

समझाओ।


अब इंसानों करना

इतनी मेहरबानी

जल सेवा कर

बन जाना तुम दानी।


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