STORYMIRROR

संदीप सिंधवाल

Abstract

3  

संदीप सिंधवाल

Abstract

जिंदगी निखर गई

जिंदगी निखर गई

1 min
239

तूझे देख कर मेरी भी मुस्कान निकल गई है

लोहे से कठोर थी रूह अब वो पिघल गई है।


बड़ी मशक्कत से संवार के रखी थी जिंदगी

कुछ साजिशों की आफत उसे निगल गई है।


एक कलाकार की लगन नहीं देखती दुनिया

आग से उसकी मेहनत मोम सी गल गई है।


अपने रास्तों पर चलने की ही आदत मुझे

उनके भ्रमित रास्तों पे चाल फिसल गई है।


जब से कम जरूरतों में ही खोजी है खुशी

हर कसौटी पर मेरी जिंदगी निखर गई है।



రచనకు రేటింగ్ ఇవ్వండి
లాగిన్

Similar hindi poem from Abstract