STORYMIRROR

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

3  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

जिंदगी की आपाधापी

जिंदगी की आपाधापी

1 min
207

जिंदगी की आपाधापी में

हम खुद को भूल गये हैं

दूसरों की रसाकस्सी में

हम खुद से रूठ गये हैं

हम दूसरों को गिराने में,

हम खुद ही गिर गये हैं

दुसरो को पत्थर मारने में

खुद लहूलुहान हो गये हैं

जिंदगी की आपाधापी में,

हम ख़ुद से ही हार गये हैं

जिंदगी की इस दौड़ में,

हम जीतकर हार गये हैं

हम अपनों की मदद में,

खुद बेसहारा हो गये हैं

उम्र-रेत फिसली हाथ से,

हम हाथ मलते रह गये हैं

जिंदगी की आपाधापी में,

खुद से ही महरूम हो गये हैं

ये अनुभव किया साखी ने,

जब तक जिस्म में जान है

कर ले खुद की पहचान है

उम्र ढली,बुढापा आया

फिर कुछ न हाथ आया

जिंदगी समझते-समझते,

हम श्मशानवासी हो गये हैं

खुद को भीतर समझने से,

हम खुदा के प्यारे हो गये हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy