जिज्ञासा
जिज्ञासा
जिज्ञासा का सागर अनन्त अपार होता है
हर किसी की सोच का अपना विस्तार होता है।
जिज्ञासा किसी की प्रभु को जानने की
तो कोई अंतरिक्ष को जानना चाहता है।
कोई जानना चाहता है पर्वतों को
तो सागर की गहराई है जिज्ञासा किसी की
पर.....
कुछ बंदे होते हैं जिज्ञासु इस हद तक,
के जानना है उनको हर किसी की ज़िन्दगी में।
किसी न क्या पहना, क्या खाया पिया है,
के रिश्ता किसी का टूटा या बना है।
बेटी ने किसकी क्या पहनें है कपड़े,
के बेटा किसी का कितना पढ़ा है।
जिज्ञासा जो रक्खो तो झांको हर घर में,
के कोई रात भूखा सोया तो नहीं है।
देखो के तन हैं न सबके ढके,
के आँचल किसी का फटा तो नहीं है।
आँखें न जागे किसी की रात भर,
के तपती ज़मी पे कोई सोया तो नहीं है।
ज्ञान अपार भरा है जगत में,
कभी मन की आँखों से जग को तो देखो।।
