जब वो सैर पे निकलते हैं
जब वो सैर पे निकलते हैं
जब वो सैर पे निकलते हैं
शाम या सहर पे निकलते हैं।।
आंखें मलते हुए हर उम्र
तड़के सड़क पे निकलते हैं ।।
एक दीदार से दिल भरता कहाँ
बस दिलों से आहें निकलते हैं।।
अरमानों को दबोच कर दिलों में
बेवजह दिलजले निकलते हैं।।
बयारों की हरकत भी चोरों जैसी
चुराकर खुशबुओं को निकलते हैं।।
मासूमियत की उनकी उन्हें मालूम क्या
जिगर से जाँ ले कर निकलते हैं।।
अपनी नज़रों को यकीं दूँ तो दूँ कैसे
हूर जन्नत की क्या सैर पे निकलते हैं
ये सड़कें भी बा-मन चहलते वहीं तक
जहाँ मुड़ कर वो वापस निकलते हैं।।

