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Bhavna Thaker

Romance

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Bhavna Thaker

Romance

जामुनी शाम

जामुनी शाम

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आज शाम की जामुनी रंगीनियाँ

कुछ कह रही है कानों में गुनगुनाती 

मादक रस छलकाती !

 

मैख़ाने की दहलीज़ से जो

बहती है एक नशीली गंध 

वो कुछ कुछ तुम्हारी साँसों से

बहती बहका जाती है !


हाँ ये तुम्हारे लबों पर

ठहरे तील की सरगोशियाँ

मेरी नस-नस में खुमार जगाती

करीब लाती है तुम्हारी ओर खींचती,

मेरी ऊँगलियों को तुम्हारे गेसू से

खेलने की दावत देती !


ए मल्लिका ए हुश्न है बंदे को

इजाज़त गर रुख़सार को

चुमती लटें सँवार दूँ !


जरा नज़दीकीयाँ बढ़ाओ

एक लहजे से उठती तुम्हारी पलकों पर

बैठी हया की चिलमन हटा लूँ तो

शाम चले अपनी हल्की रफ्तार पर !

 

रूप की रोशनी से रश्मियाँ

रुपहली छलकती है

तुम्हारे तन की परत से

कुछ-कुछ चाँदनी के साये सी !


तुम्हारी नासिका से बहती 

संदल सी महकती साँसे

टकराती हैं मेरे वजूद को

नशेमन में बहकाती !

 

ए हुश्नवाले रहम की इल्तिजा है 

इश्क को बहा ले जाती है

आँधी तुम्हारी देह की

नाजुक नज़ाकत की !


"सुनो सनम"

मैं अपनी हर एक साँस

आज इस गुलाबी

शाम के नाम करुँ

मेरे सीने पे सर रखकर

पंखुड़ियों सी जो

बरस जाओ मुझ पर।


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