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Satish Chandra Pandey

Romance

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Satish Chandra Pandey

Romance

गुनगुनी धूप सी तुम

गुनगुनी धूप सी तुम

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बढ़ रही ठंड में

गुनगुनी धूप सी तुम

जिन्दगी में सुगंध फैलाती

मनोहर धूप सी तुम।

मुस्कुराहट इस तरह की

नाजुक सी,

ठोस के साथ में घुलती

जरा सा भावुक सी।

कभी आलिम 

कभी हो पागल सी,

नेह से पूर्ण 

ढकते आँचल सी।

किसी झरने की

प्यारी कल कल सी

भार्या ही नहीं तुम तो

हो खुशियाँ पल-पल की।


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