इंसानियत
इंसानियत
इंसानियत की रोशनी गुम हो गई कहां,
छाया तो हैं आदमी का मगर आदमी कहां,
दिन व दिन इंसानियत लुप्त हो रही है,
इंसानियत के नाम पर ठगी हो रही है।
सच्चाई थी पहले इंसानों की जुबानों में,
सोने के दरवाजे थे मिट्टी के मकानों में,
किस किस पे यकीन करें
हर मुकाम पे हेरा फेरी हो रही है,
इंसानियत के नाम पर ठगी हो रही है।
जिसके हाथ कलम है, उसका ही जोर है, करता है मन मर्जी
दूसरों को समझता कमजोर है,
समझता नहीं कि मालिक को हरेक की खबर है,
वो सब जानता है किसी की कौन सी डगर है,
बेईमानी धड़ल्ले से हो रही है,
इंसानियत के नाम पर ठगी हो रही है।
जिसे पूछो नहीं मिल रहा न्याय,
ईमानदारी को दे दिया मिट्टी में मिलाए,
गरीब अभी भी फिर रहा भूखा बेचारा,
न खुद खाने को न घर का गुजारा,
फैमली उसकी भूखी सो रही है,
इंसानियत के नाम पर ठगी हो रही है।
घर के बुजुर्गों को कोई देख न पाए,
भड़कते हैं दर बदर बन के असहाय,
बेटे की दुल्हन मजे से सो रही है,
इंसानियत के नाम पर ठगी हो रही है।
हर जगह है चापलूसी का जमाना,
इंसानियत क्या है किसी ने नहीं पहचाना,
चापलूस की हर जगह चांदी हो रही है,
इंसानियत के नाम पर ठगी हो रही है।
कहां जाए इंसान बेचारा
बिना सिफारिश नहीं गुजारा,
ईमानदार लगा है लाइन में बेचारा,
कोरोना के चक्कर में लुट गया बेचारा,
बेईमान का हर कोई सहारा,
गरीब को तकलीफ हर जगह हो रही है,
इंसानियत के नाम पर ठगी हो रही है।
कहे सुदर्शन पकड़ लो इंसानियत की डोर,
न पड़े कोई अबला, कमजोर,
गंगा में डुबकी लगाकर अगर
कर लो गये तीर्थ हजार,
उनका क्या फायदा जब तक बदले नहीं विचार,
सभी मिल कर आईना कोई ऐसा बना लो,
चेहरा ही नहीं
अपना किरदार दिखा दो,
कभी न दिखे कोई अबला कमजोर,
जीवंत रहे सदा इंसानियत की डोर।
