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गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Inspirational

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गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Inspirational

मानवता का संदेश सुनाने आया हूॅं

मानवता का संदेश सुनाने आया हूॅं

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 मानव जीवन अमूल्य है इसका मोल न चुकाया जाए,

मूक पशुओं की निर्मम हत्या से कब तक लहू बहाया जाए ?

आत्मानंद-घासी व गुरु गहिरा बिन,

रक्त पीते समाज को कहो कैसे समझाया जाए ?

सतनामी नहीं पर मैं वही पावन सतनाम जगाने आया हूॅं,


व्यथित मनोभावों का मैं संताप मिटाने आया हूॅं...

दानवता को मानवता का वह संदेश सुनाने आया हूॅं..(१)


बेटियों प्रति दूर सारे अंतर्विकार होनी चाहिए,

अग्नि परीक्षित सीता की क्या शेष कोई चित्कार होनी चाहिए ?

सब कुछ सहती उस सर्वहारा प्रजाति की,

सर्वोदय-सुविचार से सादर सत्कार होनी चाहिए।


कृष्ण नहीं पर मैं सैरंध्री को सम्मान दिलाने आया हूॅं,

अत्याचार-अनाचार को आदर्श का मैं पाठ पढ़ाने आया हूॅं..

गुरु घासी के मानवता का वही संदेश सुनाने आया हूॅं..(२)


ईर्ष्या अहम् परोपकार बिन परिवार परिवार नहीं होता,

माॅं को याद किए बिना दिवस इतवार नहीं होता ।

मंदिर मस्जिद में उसे तलाशना बंद करो ,

क्योंकि बिन भाव सद्भाव के कोई सदाचार नहीं होता ।।

मूर्तियों की जगह मात-पितु को भगवान बताने आया हूॅं,

अरपा पैरी की धूमिल वो जलधार धुलाने आया हूॅं..

अकर्मण्य मानवता का वही संदेश सुनाने आया हूॅं..(३)


वाह रे मानव तूने उसे ही मूरत में कैसे ढाल दिया,

जिसने मानवता के सारे सूत्र बड़े ही कमाल दिया।

घासी को नहीं घासी के संस्कार को पूजो,

जिसने काली रात में भी चमकता हुआ प्रातः काल दिया।


इसीलिए क्षीण मानवता को मैं याद दिलाने आया हूॅं,

त्याग-तपस्या करुणा विहीन वह समाज बचाने आया हूॅं..

उस सुधारक के मानवता का मैं संदेश सुनाने आया हूॅं..(४)


महंगूदास के बेटे ने युवाओं से कभी आवाहन किया था,

डगमग-डगमग जीवन का ओजस्वी संचालन किया था ।

निस्तेज नजरों से कोई मान क्या सम्मान क्या,

जिसने सृष्टि सम्मान का सहज आकलन किया था।

इसलिए सोए हुए हे सिंह जगो मैं तुम्हें जगाने आया हूॅं,


मद-मदिरा-मांसाहार का मैं अंधत्व मिटाने आया हूॅं..

व्यभिचार से परे मानवता का वह संदेश सुनाने आया हूॅं..(५)


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