आज़ादी
आज़ादी
कभी देखा उसको पीछे छुपते सामाजिक आड़ के, कभी देखा उसको पीछे छुपते कुरीतियों के किवाड़ के, हर घर ने उसको देहलीज दिखाई, हर ज़ुबान ने उसको तमीज़ बताई, पर कहीं किसी कोने में एक आज़ादी कि चीख थी, जो उसके कानों तक किसी ने नहीं पहुंचाई।
कभी देखा उसको खुद में ही सिमटते, कभी देखा उसको खुद को ही बेड़ियों में जकड़ते, हर बंधन ने उसके परों को बांध के कोई पुरानी रीत निभाई, हर ज़ंजीर ने उसके हाथ बांध कर कोई कुप्रथा बचाई, पर कहीं किसी कोने में एक आज़ादी कि चीख थी, जो उसके कानों तक किसी ने नहीं पहुंचाई।
कभी देखा उसको त्याग की देवी बनते, कभी देखा उसको मंदिर की घंटियों में बजते, हर सपनों से उसका अपहरण कर किसी मर्द को भेंट चढ़ाई गई, कितनी तालीम लेगी जैसे सवालों के सलाखों से उसकी गरिमा दागी गई, पर कहीं किसी कोने में एक आज़ादी कि चीख थी, जो उसके कानों तक किसी ने नहीं पहुंचाई।
एक रोज़ उसने दहलीज लांगी, एक रोज़ उसने तमीज से फुर्सत मांगी, एक रोज़ उसने उस चीख को अपने कानों तक आने दिया, एक रोज़ उसने भी आज़ादी को अपने लफ़्ज़ों पर सजाने दिया।
एक रोज़ उसने बेड़ियां तोड़ी, एक रोज़ उसने सारे बंधनों से दोस्ती तोड़ी, एक रोज़ उसने उस चीख का सरोकार किया, एक रोज़ उसने भी आज़ादी से प्यार किया। एक रोज़ उसने मंदिर के कपाट को खोला,
एक रोज़ खुद को देवी ना कहके खुद को इंसान बोला, एक रोज़ उसने उस चीख को दुनिया के सामने पेश करा, एक रोज़ उसने भी आज़ादी का भेष धरा। एक रोज़ उसने भी सपनों के पीछे दौड़ लगाई,
एक रोज़ उसने भी ऊंची तालीम पाई, एक रोज़ उसने भी उस चीख से दुनिया को हिलाया, एक रोज़ उसने भी पूरी आज़ादी जीत कर अपने अस्तित्व का परचम लहराया।
