काष्ठ के मन हो गए
काष्ठ के मन हो गए
इस संसार में काष्ठ के मन हो गए
मन में संवेदनाओं के चिराग जलते नहीं
काठ सी मुरत बने मानव यहां वहां खड़े हो गए
किसी लाज लुटे इनके निर्मम मन इतने हो गए
नारि हो या पुरुष सब के अंतर्मन कुंद हो गए
अपने अपने मकड़ जाल में फंसे हुए रह गए
बेचारगी मैं लपेटकर स्त्रि विमर्श के लिए चर्चित हो गए
इन के मन तो काठ के कठफूले की तरह हो गए
घर की स्त्रियों को मुंह खोल कर हँसने की आजादी नहीं
खुद मयखाने की रौनकों में लिप्त शरमो हया खो गए
झूट मूठ को दहाड़ मारते दर्जा बराबर का होना चाहिए
अधिकारी अगर स्त्री हुई तो बेमन से अदब में खड़े हो गए
काठ मार गया है इन तालिमे आफता नौजवान पीढ़ी को
माँ बाप को जिल्लत भरी जिंदगी जीने को बाध्य कर गए
मन ही नहीं तन से भी अधिकार बाँटना होगा
खुद कठपुतली बना रहा दूसरे निर्बाध निर्णय ले गए
शियां स्वर्ण को कैद करने से नही मिलती
फूल सी मुस्कराहट बाँटने वालों के दिल खिल गए।
