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लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

Tragedy

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लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

Tragedy

"हत्यारे"

"हत्यारे"

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हरे वृक्ष नित काट रहे हैं,

हत्यारे ने न हम हैं कम।

जीवन का वरदान हैं वृक्ष,

फिर भी हमें न कोई ग़म।।


छल कपट फ़रेब बढ़ गया,

गिरता जा रहा है ईमान।

जीव जंतुओं को मार रहे,

हत्यारे के हम हैं समान।।


मनुजता अब खत्म हो रही,

मानव अधिकारों का हुआ हनन।

स्वार्थ की हो गई पराकाष्ठा,

नैतिकता का बिल्कुल है पतन।।


जीव जंतुओं को मार हम,

भोजन का ग्रास बना खा जाते हैं।

व्यक्ति को यदि जान से मारे,

हत्यारे हम कहलाते हैं।।


हत्या जैसा घृणित कार्य,

सृष्टि में दूजा न कोई पाप है।

कानूनन हम अपराधी होते,

जो कभी न होता माफ़ है।।


सदविचार व सद्कर्मों से हम,

जीवन अपना सफ़ल बनाएँ।

अन्याय, पीड़ा व शोषण भी,

हत्या के सदृश्य ही कहलाए।।



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