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Pradeep Sahare

Tragedy


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Pradeep Sahare

Tragedy


एक्सल

एक्सल

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नौकरी में,

जिंदगी भी साली,

एक्सल पर,करते काम।

एक्सल जैसे हो गई।

ना जाने,

खुद को प्रेजेन्ट करने।

कितने कॉलम ,

और रेखाओं, को जोड़ते।

रखते हमेशा अपडेट,

बॉस को समझने,

बॉस को समझाने ।

पाँवर पाँइंट की स्लाईड जैसे।

सोचते हमेशा नौकरी में,

नौकरी सही या धंदा ।

करते रहते,स्लाईड को,

उपर से नीचे ।

लगाते रहते फार्मुला,

जिंदगी की लाइन में।

आने वाले पगार का।

जोडते घटाते कॉलम,

आने वाला खर्चा देखकर।

एक्सल शीट का,

देखकर हेडिंग ।

सोचते और क्या ..

कर सकते ?

पैसा कमाने...

लेकिन ड़रते ।

हायलाईट किये,

कॉलम की तरह।

नौकरी जाने के ड़र से।

होते हैं खुश कभी,

प्रमोशन या इन्क्रिमेंट पाकर।

जैसे लगता हैं,

खुश हुवा बॉस ।

भेजी हुई रिपोर्ट देखकर ।

दिखती कभी बॉस की,

मस्तक की रेखा,

करप्ट हुई फाईल सी ।

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मुझे देखकर..

सोचता हूं,

कर दूं डिलिट सब..

लेकिन,इक्वल टू,

 बताता हैं बॉस भी तो!

अपने जैसा ही है ।

खयाल आते ही,

अपने जैसा,

निकलता हूं,

कोट पहनकर,

टाई लगाकर ऑफिस।

दूसरी फाईल खोलने ।

छिपाकर भावनाओं को,

एक फोल्डर के अंदर।



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