STORYMIRROR

अमित प्रेमशंकर

Romance

4  

अमित प्रेमशंकर

Romance

हटिया टू मुम्बई

हटिया टू मुम्बई

1 min
338


ठीक सामने बैठी थी वो

जाने क्यों मुस्काती थी

कभी कुरकुरे कभी चिप्स तो

च्विंगम कभी चबाती थी

बालों को वो खोल कभी

यूं हाथों से लहराती थी

कभी आंख से आंख मिलाकर

खिड़की पे सो जाती थी

फिर खिड़की से उठकर पगली

बेचैन सी होती थी।।

तिरछी नजर से देख मुझे वो

मंद मंद मुस्काती थी

थैले से निकाल फोन में

फेसबुक कभी चलाती थी

कभी फोन को, कभी मुझे

वो देख देख मुस्काती थी

नाक की नथुनी गज़ब की थी

चेहरे से मासुम लगती थी

सच में जान निकल जाती थी

जब जब वो मुस्काती थी

         


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance