हथेली पर आसमान लिए खड़ा
हथेली पर आसमान लिए खड़ा
क्यों बेवजह फुदकता इधर उधर
जमीं पर आसमान लिए खड़ा हूँ
दिल छलनी कर गया
क्या जाने दिल की पीर
मचलती घटाओं को देख
बावरा मन हुआ अधीर
इक निर्जन मरुस्थल के तट पर
पलकों में तूफ़ान लिए खड़ा हूँ
मेरे अनसुने गीतों को
यूँ छोड़ कर मत जाना
फूलों से भी नाजुक है
यूँ तोड़ कर मत जाना
तेरी चंचल जवानी की चौखट पर
दिल में प्यासे अरमान लिए खड़ा हूँ
अपनी बाहों में भरकर
आओ मुझे अंगीकार करो
इस पल को साक्षी मान
आओ मुझे स्वीकार करो
जिंदगी के आखिरी दरवाजे पर
बचपन की मुस्कान लिए खड़ा हूँ
तारे उतर आयें जमीं पर
चलो ऐसी इक रात करें
चांदनी भी मुस्कुरा दे
चलो कुछ ऐसी बात करें
तेरे अहसानों तले ज़िन्दगी दबी है
हथेली पर आसमान लिए खड़ा हूँ।

