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Meenakshi Kilawat

Abstract

4.8  

Meenakshi Kilawat

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हर रोज यहाँ जमाने को

हर रोज यहाँ जमाने को

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हर रोज यहाँ जमाने को

मैंने बदलते हुए देखा है

जिंदगी को न जाने क्यों

मैंने सिसकते हुए देखा है।


जब चलते थे तो उन्हे मैंने

सीना ताने चलते देखा है

उनको आज पाँव उठाने के लिए

सहारे को तलाशते देखा है।


नजरों की चमक देखते थे

तो सहम जाते थे परिवार

उन्ही नजरों को बरखा की

तरह बरसते देखा है बार-बार।


जिनके हाथों के इशारे से

दौड़ पडते थे जाबाज़

उन्ही हाथों को हवा की तरह

थरथराते देखा है मैंने आज।


जिनके गले में कभी थी

बिजली-सी कड़कती आवाज़

उन होठों पर भी मजबूरी

का ताला लगा देखा है आज।


जवानी के साए कुदरत की

बेशकीमती इनायत है इंसान

इनके जाते ही बेजान-सा

देखा है महल का नुकसान।



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