हमसफ़र
हमसफ़र
चाँद फिसल रहा बादल में
पत्तों की सरसराहट ने
राग नया छेड़ दिया
धाराओं की बलखाती चाल पर
हवाओं ने है डेरा डाल लिया
तुम आईना
परछाई भी
सुबह के सूरज
रात के चाँद भी
बारिश की छींक
सर्दी की धूप भी
नींद में
एक ख़्वाब
पलकों पर सजे
श्रृंगार भी
आँचल के कोर
रेशम की डोर भी
हर रंग के
एक चित्र
हर मौसम में
एक मित्र तुम
अहसास में
एक बोल
बहुत शोर में
एक आवाज़ तुम
सपनों के शुरूआत
ख़्वाहिशों की बुनियाद तुम
दिल की गहराई से
आकाश तक
एक ऊँचाई तुम
लिखती हूँ
तुम्हारी कलम से
कुछ किस्सें
कभी नगमें
तुम खुशी की
फसल काटो
मैं गम़ के
बीज रख लूँगी
तुम्हारी आँखों की
बहुत रौशनी को
सजाती.....सवाँरती.....मैं....

