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मिली साहा

Abstract

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मिली साहा

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हमारी दोस्ती

हमारी दोस्ती

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हमारी बचपन की दोस्ती का वो ख़ूबसूरत तराना,

आज भी बसा है दिल में, कहीं वो मौसम सुहाना।


एक अलग ही उमंग रहती थी दोस्तों से मिलने की,

कितने अच्छे दिन थे वो, था कितना अच्छा ज़माना। 


बनाते कैसे-कैसे बहाने, दोस्तों के साथ खेलने को,

अब तो बहाने भी नहीं मिलते बस यादों में है रहना।


वो बारिश की फुहार में मस्ती वो काग़ज़ की कस्ती,

आज भी उन यादों को समेटे है दिल का एक कोना।


उलझ गए हैं हम, अपनी जिम्मेदारियों में इस क़दर,

कि चाह कर भी नहीं हो पाता एक दूसरे से मिलना।


ज़िंदगी बढ़ती गई बिछड़ता गया दोस्ती का कारवां,

कभी वक्त कभी हालात बना न मिलने का बहाना।


काश कि मिल जाए, दोस्ती की फिर वही फुलवारी,

एक बार फिर दोस्तों के साथ, वही बचपन है जीना।


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