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Kunda Shamkuwar

Abstract Drama Fantasy

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Kunda Shamkuwar

Abstract Drama Fantasy

हिसाब किताब

हिसाब किताब

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माँ कहा करती थी कि तुम बचपन से ही हिसाब किताब में कच्ची हो....

स्कूल में हर बार मैं गणित के सवालों में उलझते ही रही.... 

जहाँ मुझे गुणाकार करना होता था वहाँ मैं भागाकार करती....

और जहाँ जोड़ना होता था वहाँ घटाते जाती.....


गणित की यह उलझन जिंदगी भर मेरे परेशानी का सबब बनी रही.....

मैं कभी ना रिश्ते जोड़ पायी और ना ही उनका गुणाकार कर सकी.....

अपने हक़ को मैंने ताउम्र घटते हुए या उनमें भागाकार होते ही देखा है..

लेकिन हर बार मैं गणित के सवाल ग़लत ही नहीं बल्कि कुछ सही भी हल करती रही.....

इसलिए कि मेरा शिकवों  और शिकायतों का हिसाब हमेशा सही रहा...


ऐसा ही मेरा हाल रातों में तारों की गिनती का भी रहा....

और इसी तरह मेरे कच्चे हिसाब से तारोंं की गिनती भी अधूरी ही रही

अधूरी नींद और कच्चे हिसाब किताब से जिंदगी इसी तरह चलती रही....

जिंदगी भी क्या खोया क्या पाया में गणित की तरह उलझती रही...

मैं कभी जान न सकी की कुछ रिश्तों में फ़ासलों की दरकार होती है.... 

और कुछ रिश्तों में आये फ़ासलों का मैं कभी हिसाब नहीं कर सकी....

मैं बचपन में ही हिसाब किताब में कच्ची जो थी....



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